आंखों, मुंह के छालों, पेट की परेशानियों और बवासीर में दिलाए आराम, जानें 'दूब' घास के फायदे

बालकृष्ण ने कहा कि दूर्वा क्वाथ से कुल्ले करने से मुंह के छालों में लाभ होता है. इसी तरह उदर रोग में 5 मिली दूब का रस पिलाने से उल्टी में लाभ होता है. दूब का ताजा रस पुराने अतिसार और पतले अतिसारों में उपयोगी होता है. दूब को सोंठ और सौंफ के साथ उबालकर पिलाने से आम दस्त में आराम मिलता है.
गुदा रोग में भी दूब लाभकारी है. दूर्वा पंचांग को पीसकर दही में मिलाकर लें और इसके पत्तों को पीसकर बवासीर पर लेप करने से लाभ होता है. इसी तरह घृत को दूब स्वरस में भली-भांति मिलाकर अर्श के अंकुरों पर लेप करें साथ ही शीतल चिकित्सा करें, रक्तस्त्राव शीघ्र रुक जाएगा. दूब को 30 मिली पानी में पीसें तथा इसमें मिश्री मिलाकर सुबह-शाम पीने से पथरी में लाभ होता है.
उन्होंने कहा कि दूब की मूल का काढ़ा बनाकर 10 से 30 मिली मात्रा में पीने से वस्तिशोथ, सूजाक और मूत्रदाह का शमन होता है. दूब को मिश्री के साथ घोंट छान कर पिलाने से पेशाब के साथ खून आना बंद हो जाता है. 1 से 2 ग्राम दूर्वा को दुध में पीस छानकर पिलाने से मूत्रदाह मिटती है.
रक्तप्रदर और गर्भपात में भी दूब उपयोगी है. दूब के रस में सफेद चंदन का चूर्ण और मिश्री मिलाकर पिलाने से रक्तप्रदर में लाभ होता है. प्रदर रोग में तथा रक्तस्त्राव एवं गर्भपात जैसी योनि व्याध्यियों में इसका प्रयोग करने से रक्त बहना रुक जाता है. गर्भाशय को शक्ति तथा पोषण मिलती है. श्वेत दूब वीर्य को कम करती है और काम शक्ति को घटाती है.
आचार्य बालकृष्ण ने कहा कि इसके अलावा भी दूब का उपयोग कई अन्य रोगों में इलाज के लिए किया जाता है। उन्होंने कहा कि वस्तुत: दुर्वा प्रत्येक भारतीय के निकट रहने वाली दिव्य वनौषधि है, जो किसी भी परिस्थिति में हरी-भरी रहने की सामथ्र्य रखती है और प्रत्येक रोगी को भी पुनर्जागृत बनाती है.
Comments
Post a Comment